Yagnik Ratnam Pdf In Hindi -

विश्वरथ ने उत्तर दिया, "नहीं। मेरे गाँव में तीन वर्ष से सूखा है। लोग भूखे मर रहे हैं। मैं वह यज्ञ करना चाहता हूँ जो मेघों को बुला सके।"

विश्वरथ लौटा और बिना किसी दिखावटी अनुष्ठान के, केवल एक वट वृक्ष के नीचे बैठकर करुणा से भरे मंत्रों का जाप किया। तीसरे दिन घनघोर वर्षा हुई। गाँव हरा-भरा हो गया। तब लोगों ने उसे "याज्ञिक रत्नम" की उपाधि दी— यानी वह ब्राह्मण जो स्वयं एक रत्न बन गया। yagnik ratnam pdf in hindi

विश्वरथ के गुरु, महर्षि देवदत्त ने उसे बताया था कि यह पोथी सिर्फ मंत्रों का संग्रह नहीं, बल्कि एक ऐसी मणि (रत्न) के स्थान का नक्शा है, जो स्वयं अग्निदेव के मुख से निकली थी। उस मणि को धारण करने वाला यज्ञ इतना शक्तिशाली हो जाता है कि वह मृत प्रकृति को भी जीवित कर सकता है। पर उस मणि की रक्षा एक रहस्यमय यक्ष करता है। विश्वरथ ने उत्तर दिया

फिर भी, अगर मैं "याज्ञिक" (यज्ञ करने वाले ब्राह्मण या पुरोहित) और "रत्नम" (रत्न/मणि) शब्दों के आधार पर एक कल्पित कहानी प्रस्तुत करूँ, तो वह कुछ इस प्रकार हो सकती है: yagnik ratnam pdf in hindi

यक्ष मुस्कुराया और बोला, "तो क्या तुम अपनी एक आँख अग्नि में आहुति दे सकते हो, जैसा कि पोथी में लिखा है?"

काशी के घाटों पर सूर्योदय की स्वर्णिम रेखाएँ फैल रही थीं। गंगा के तट पर स्थित एक प्राचीन मंदिर के गर्भगृह में ब्राह्मण कुमार विश्वरथ अग्निहोत्र की तैयारी कर रहा था। उसके हाथों में एक पीतल की कमंडल और ताड़पत्र की एक पुरानी पोथी थी। पोथी के अंतिम पन्ने पर लिखा था— "याज्ञिक रत्नम" ।